“लूट का दस्तावेज” या पावर प्ले? विद्युत कर्मचारियों का निजीकरण पर करारा वार!

महेंद्र सिंह
महेंद्र सिंह

उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल और दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण को लेकर बवाल मचा हुआ है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने इसे सीधे शब्दों में कहा — “लूट का दस्तावेज़”

समिति ने आरोप लगाया है कि इस पूरे प्रोसेस में कुछ चुनिंदा कॉरपोरेट घरानों को फायदा पहुंचाने के लिए जानबूझकर 1 लाख करोड़ की संपत्ति की कीमत सिर्फ 6500 करोड़ रुपये बताई गई है।

“इतनी बड़ी छूट तो Flipkart पर भी नहीं मिलती!”

नियामक आयोग से दो टूक मांग — “दस्तावेज़ रद्द करो, नहीं तो मौन प्रदर्शन तय”

पावर कॉरपोरेशन द्वारा तैयार किए गए RFP डॉक्युमेंट को लेकर संघर्ष समिति ने कहा कि ये दस्तावेज़ प्राइवेट कंपनियों से मिलीभगत में बनाए गए हैं।

उन्होंने उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग (UPERC) के अध्यक्ष अरविंद कुमार को पत्र लिखकर चेतावनी दी है कि अगर दस्तावेज़ वापस नहीं लिए गए तो कर्मचारी आयोग कार्यालय पर मौन धरना देंगे।

“2020 का समझौता क्या भूल गए?”

संघर्ष समिति ने याद दिलाया कि 5 अक्टूबर 2020 को जब अरविंद कुमार खुद पावर कॉरपोरेशन के चेयरमैन थे, तब उन्होंने एक लिखित समझौते पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें साफ कहा गया था कि, “बिना बिजली कर्मचारियों की सहमति के निजीकरण नहीं होगा।”

अब वही दस्तावेज़ मंजूरी के कगार पर हैं, जिसे कर्मचारी “विश्वासघात” मान रहे हैं।

गोपनीय फाइलों की चोरी का आरोप – “निदेशक वित्त के पास फोटोस्टेट मशीन ज़्यादा चलती है”

संघर्ष समिति ने निदेशक वित्त निधि नारंग पर आरोप लगाया है कि उन्होंने निजीकरण से जुड़ी 10+ गोपनीय फाइलों की कॉपी अपने पास रख ली है।

“भाईसाहब! कोई CBSE का पेपर नहीं लीक कर रहे, ये पावर कॉरपोरेशन की फाइलें हैं!”

समिति की मांग है कि निदेशक वित्त का कमरा तुरंत सील किया जाए ताकि डॉक्युमेंट्स का दुरुपयोग न हो सके।

कर्मचारियों की मिशन मोड पर जनजागरूकता — “घोटाले के खिलाफ बिजली जनता को जगाएगी”

रविवार के अवकाश के बावजूद, संघर्ष समिति के पदाधिकारी मैदान में डटे रहे और अलग-अलग ज़िलों में लोगों से मिलकर बताया कि:

  • कैसे सरकारी संपत्तियों को औने-पौने दामों पर बेचा जा रहा है।

  • कैसे यह पूरा मामला सिर्फ प्राइवेट पार्टनर को फायदा पहुंचाने के लिए डिजाइन किया गया है।

  • और कैसे ये जनता के पैसे की खुली लूट है।

“पब्लिक है सब जानती है!”

इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा सवाल यही है — क्या सरकारी संपत्तियों को गुपचुप तरीके से बेचना अब नया नॉर्मल है?

और अगर यह दस्तावेज पास होते हैं, तो घोटाले के नए चैप्टर की शुरुआत तय है।

“पावर कॉरपोरेशन को अब अपना नाम बदल लेना चाहिए — ‘Public से Private तक की कहानी, एक RFP में पूरी!’

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